दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह पर्व पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मैं Md Saif, बिहार के भागलपुर से हूँ, और बचपन से देखता आ रहा हूँ कि कैसे इस दिन पूरा गांव मेला जैसा सज जाता है।
यह त्योहार सिर्फ रावण दहन तक सीमित नहीं है, इसके पीछे धर्म, साहस, नवीनीकरण और विजय की गहरी कहानी है। इस लेख में मैं आपको दशहरे से जुड़ी दो प्रमुख कथाएं और बिहार में इसे कैसे मनाया जाता है, विस्तार से बताऊंगा।
*1. रामायण की कथा: रावण पर भगवान राम की विजय*
उत्तर और पश्चिमी भारत में दशहरा भगवान राम और रावण के युद्ध की जीत के रूप में मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम ने 14 साल के वनवास के दौरान रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था।
इसके बाद भगवान राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की। 9 दिनों तक भयंकर युद्ध चला। दसवें दिन, यानी विजयदशमी के दिन भगवान राम ने रावण का वध करके बुराई पर अच्छाई की जीत स्थापित की। इसीलिए इसे विजयदशमी कहा जाता है - विजय + दशमी।
हमारे भागलपुर में दशहरे से 9 दिन पहले रामलीला शुरू हो जाती है। स्थानीय कलाकार राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान का रूप धरकर पूरी रामायण का मंचन करते हैं। दसवें दिन सबसे बड़ा आकर्षण होता है रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के 50 फीट ऊंचे पुतलों का दहन। हजारों लोग मैदान में इकट्ठा होते हैं, और जैसे ही राम जी तीर मारते हैं, पूरा मैदान जय श्री राम के नारों से गूंज उठता है।
*2. महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय*
वहीं पूर्वी भारत, खासकर पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में यह दिन दुर्गा पूजा के समापन के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था कि कोई देवता या मानव उसे नहीं मार सकता।
वरदान पाकर वह बहुत अहंकारी हो गया और स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। सभी देवता परेशान होकर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा के पास गए। तब तीनों की शक्तियों से देवी दुर्गा प्रकट हुईं। 9 दिनों तक दुर्गा और महिषासुर के बीच घमासान युद्ध चला। दसवें दिन देवी दुर्गा ने त्रिशूल से महिषासुर का वध किया।
इसीलिए बंगाल और बिहार में विजयदशमी के दिन दुर्गा माता की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। हम इसे 'सिंदूर खेला' भी कहते हैं। महिलाएं माता को सिंदूर लगाती हैं, एक-दूसरे को लगाती हैं और फिर ढोल-नगाड़ों के साथ माता को विदा करती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि बुरी शक्तियों पर दैवीय शक्ति की हमेशा जीत होती है।
*दशहरा कैसे मनाया जाता है? - 5 मुख्य परंपराएं*
1. *रामलीला और सामुदायिक सभाएं:* कई जगहों पर 10 दिन तक रामलीला होती है। पूरा मोहल्ला एक साथ बैठकर इसे देखता है। यह सिर्फ नाटक नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का तरीका है।
2. *रावण दहन:* यह सबसे प्रसिद्ध परंपरा है। लकड़ी, कागज और पटाखों से बने रावण के पुतले को जलाया जाता है। इसका अर्थ है अपने अंदर के अहंकार, क्रोध और बुराई को खत्म करना।
3. *दुर्गा पूजा विसर्जन और विजयदशमी के अनुष्ठान:* नवरात्रि के 9 दिन उपवास रखने के बाद दसवें दिन लोग अपने घरों में शमी के पत्ते एक-दूसरे को देते हैं, जिसे 'सोना' देना कहते हैं। यह समृद्धि का प्रतीक है।
4. *परिवार का मिलन:* इस दिन सभी परिवार के सदस्य एक साथ आते हैं। मेरे घर में भी दशहरे के दिन सभी भाई-बहन इकट्ठा होते हैं। साथ में भोजन करते हैं, बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं और प्रार्थना करते हैं।
5. *नए काम की शुरुआत:* कई समुदायों में मान्यता है कि विजयदशमी के दिन शुरू किया गया कोई भी नया काम, नया व्यापार या कोई महंगी वस्तु जैसे गाड़ी, सोना खरीदना बहुत शुभ होता है। इस दिन को 'अबूझ मुहूर्त' भी कहा जाता है, यानी बिना मुहूर्त देखे भी कोई काम शुरू कर सकते हैं।
*निष्कर्ष*
दशहरा हमें सिखाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंत में जीत हमेशा सच्चाई और धर्म की ही होती है। चाहे वह राम का रावण पर विजय हो या दुर्गा का महिषासुर पर। यह त्योहार हमें अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करके एक नई शुरुआत करने की प्रेरणा देता है।
आप दशहरा कैसे मनाते हैं? कमेंट में जरूर बताएं


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